About Me

My photo
Nakhatrana-Bhuj, Kutch-Gujarat, India
World's No. 1 Database of Lord Bajrang Bali Statues and Temples in India and Abroad on Internet Social Media Site.**Dy. Manager-Instrumentation at Archean Chemical Industries Pvt. Ltd., Hajipir-Bhuj (Gujarat). Studied BE, Instrumentation and Control Engineering (First Class) at Govt. Engineering College, Gandhinagar affiliated to Gujarat University.**

Blog Archive

Showing posts with label Ramcharitmanas. Show all posts
Showing posts with label Ramcharitmanas. Show all posts

Sunday, 24 January 2016

अरण्य काण्ड_श्रीरामचरितमानस_गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी कृत

मुनि पद कमल नाइ करि सीसा । चले बनहि सुर नर मुनि ईसा ॥
आगें राम अनुज पुनि पाछें । मुनि बर बेष बने अति काछें ॥
उभय बीच श्री सोहइ कैसी । ब्रह्म जीव बिच माया जैसी ॥
सरिता बन गिरि अवघट घाटा । पति पहिचानि देहिं बर बाटा ॥
जहँ जहँ जाहिं देव रघुराया । करहिं मेघ तहँ तहँ नभ छाया ॥
भावार्थ :- मुनिके चरणकमलोंमें सिर नवाकर देवता, मनुष्य और मुनियोंके स्वामी श्रीरामजी वनको चले । आगे भगवान श्रीराम हैं और उनके पीछे छोटे भाई लक्ष्मण जति हैं । दोनों ही मुनियोंका सुंदर वेष बनाए अत्यन्त सुशोभित हैं I दोनोंके बीचमें देवी सीता कैसी सुशोभित हैं, जैसे ब्रह्म और जीवके बीच माया हो I नदी, वन, पर्वत और दुर्गम घाटियाँ, सभी अपने स्वामीको पहचानकर सुंदर रास्ता दे देते हैं I जहाँ-जहाँ देव श्रीरघुनाथजी जाते हैं, वहाँ-वहाँ बादल आकाशमें छाया करते जाते हैं ।

Sunday, 13 December 2015

सुंदरकाण्ड_गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं, ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌ ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं, वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌ II १ II
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये, सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे, कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च II २ II
भावार्थ :- शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणोंसे परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देनेवाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजीसे निरंतर सेवित, वेदान्तके द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, देवताओंमें सबसे बड़े, मायासे मनुष्य रूपमें दिखने वाले, समस्त पापोंको हरनेवाले, करुणाकी खान, रघुकुलमें श्रेष्ठ तथा राजाओंके शिरोमणि राम कहलानेवाले जगदीश्वरकी मैं वंदना करता हूँ I हे रघुनाथजी ! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके अंतरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदयमें दूसरी कोई इच्छा नहीं है । हे रघुकुलश्रेष्ठ ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिए और मेरे मनको काम आदि दोषोंसे रहित कीजिए I